पुलिस अधिकारी को टारगेट करना कितना सही ?
Akshar Nama : छिंदवाड़ा। शहर में पीत पत्रकारिता के नाम पर आजकल जो कुछ देखने पढऩे को मिल रहा है
वह पहले कभी न तो देखा गया न ही पढ़ा गया। समय के साथ पत्रकारिता का तरीका तो बदला ही है,
साथ ही इसके मायने भी बदल गए हैं। पहले व्यवस्था को सुधारने के लिए समाचार प्रकाशित होते थे लेकिन
अब व्यक्तिवादिता पत्रकारिता में साफ झलक रही है। पिछले कुछ दिनों से कोतवाली पुलिस को जिस तरह से
टारगेट कर छवि को धूमिल करने का प्रयास स्वयं भू पत्रकार द्वारा किया जा रहा है उससे आज जिले की
पत्रकारिता को ही आईना दिखाने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। खामियां तो पूरे महकमे में हैं
लेकिन बार-बार एक ही जगह पर अपनी कलम के झंडे गाढऩे का प्रयास यह साफ तौर पर दर्शाता है कि
उस स्थान या व्यक्ति को टारगेट किया जा रहा है न कि व्यवस्था को। कोतवाली से संबंधित यह मामला
अब जनता के बीच चर्चाओं में आने लगा है। ऐसी पत्रकारिता से समाज के रक्षकों का मनोबल तो गिरेगा,
साथ ही उन असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद होंगे जो समाज में असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं…
नतीजा शहर में लॉ एंड आर्डर की स्थिति बिगडऩे लगेगी। यह एकदम से तो नहीं होगा लेकिन
पत्रकारिता ऐसी ही रही तो निकट भविष्य में जरूर होगा। पत्रकारिता का उद्देश्य सिस्टम में व्याप्त खामियां
बताकर उनमें सुधार करवाना होना चाहिए न कि सिस्टम के किसी एक हिस्से पर ऐसे और
इतने वार करना कि वह टूट जाए। इससे असंतुलन पैदा होगा जो सभी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह कतई नहीं होता कि पत्रकार के रूप में कोई
किसी अन्य के अधिकारों और स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने लगे।
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